भारतीय संविधान का मूल ढांचा क्या है
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भारतीय संविधान का “मूल ढांचा” एक ऐसी अवधारणा है, जो यह मानती है कि संविधान की कुछ बुनियादी विशेषताएं इतनी महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें संसद अपने संशोधन अधिकार का इस्तेमाल करके भी पूरी तरह नहीं बदल सकती। इसमें लोकतंत्र, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और न्यायिक समीक्षा जैसी विशेषताएं शामिल मानी जाती हैं।
यह सिद्धांत सीधे संविधान के मूल पाठ में नहीं लिखा है, बल्कि यह सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या से उभरा, जब अदालत ने यह तय किया कि संसद की संशोधन शक्ति असीमित नहीं हो सकती। इस व्याख्या का मकसद संविधान की मूल भावना को भविष्य के किसी भी बड़े राजनीतिक बदलाव से बचाना था।
व्यवहार में इसका मतलब है कि संसद कानून बदल सकती है, नए प्रावधान जोड़ सकती है, लेकिन संविधान की मूल पहचान और उसकी आत्मा से छेड़छाड़ नहीं कर सकती। यह सिद्धांत आज भी भारत की न्यायिक और संवैधानिक बहसों का एक केंद्रीय हिस्सा बना हुआ है।