राजकोषीय घाटा किसे कहते हैं
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राजकोषीय घाटा तब होता है जब किसी सरकार का कुल खर्च उसकी कुल आय, यानी कर और अन्य स्रोतों से मिलने वाले राजस्व से ज्यादा हो जाता है। इस अंतर को पाटने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है, जो आमतौर पर बांड या अन्य वित्तीय साधनों के जरिए जुटाया जाता है।
थोड़ा बहुत घाटा आम बात है, खासकर जब सरकार सड़क, स्कूल या अस्पताल जैसे दीर्घकालिक ढांचागत कामों में निवेश कर रही हो, क्योंकि इनका फायदा आने वाले वर्षों में मिलता है। लेकिन लगातार बड़ा घाटा सरकार पर कर्ज का बोझ बढ़ाता है, जिसे चुकाने के लिए भविष्य में ब्याज चुकाना पड़ता है।
इसीलिए अर्थशास्त्री और नीति निर्माता घाटे के आकार पर बारीकी से नजर रखते हैं, ताकि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए टिकाऊ स्तर से आगे न बढ़ जाए। एक संतुलित राजकोषीय नीति का मकसद विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच सही तालमेल बनाना होता है।